
प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में बढ़त
भाजपा में चल रहे संगठनात्मक फेरबदल के बीच उत्तर प्रदेश अध्यक्ष पद को लेकर चर्चा एक बार फिर गहरा गई है। इस बार जिस नाम पर सबसे अधिक ध्यान केंद्रित हो रहा है, वह है साध्वी निरंजन ज्योति—एक ऐसा चेहरा जो भाजपा की वैचारिक छवि को मजबूती से स्थापित करता है।
साध्वी की पृष्ठभूमि : धर्म, समाज, राजनीति का संगम
हमीरपुर में 1967 को जन्मी साध्वी निरंजन ज्योति की आध्यात्मिक यात्रा 14 वर्ष की उम्र से ही शुरू हो गई थी। स्वामी अच्युतानंद और बाद में स्वामी परमानंद महाराज की प्रेरणा ने उन्हें संत परंपरा का प्रमुख हिस्सा बना दिया। इसी आध्यात्मिक आधार ने आगे चलकर राजनीति में उनका मार्ग प्रशस्त किया।
राम मंदिर आंदोलन की सक्रिय भूमिका
1984 से शुरू हुए व्यापक धार्मिक आंदोलन में साध्वी का योगदान उल्लेखनीय रहा। साध्वी ऋतंभरा और उमा भारती के साथ उन्होंने बुंदेलखंड से लेकर यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जनसंपर्क किया। यह दौर उनके राष्ट्रीय पहचान का महत्वपूर्ण आरंभ था।
विधानसभा से संसद तक
2002 में पहली बार विधायक बनने के बाद उन्होंने तेजी से संगठन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। लोकसभा में फतेहपुर सीट जीतने के बाद मोदी सरकार में उन्हें खाद्य प्रसंस्करण, ग्रामीण विकास और उपभोक्ता मामलों जैसे अहम मंत्रालयों का दायित्व सौंपा गया।
ओबीसी समीकरण में मजबूत पकड़
निषाद समुदाय से होने के कारण वह भाजपा के सामाजिक समावेशन मॉडल का महत्वपूर्ण पक्ष मानी जाती हैं। वंचितों, पिछड़ों और ग्रामीण वर्ग में उनकी सक्रिय पकड़ उन्हें संगठन के लिए अत्यंत उपयोगी बनाती है।
क्या बीजेपी का अगला कदम वे होंगी?
प्रदेश के लिए भाजपा किसी ऐसे नेता की तलाश में है, जो संगठन, समाज और विचार तीनों को एक साथ साध सके। साध्वी का नाम इसी त्रिकोणीय संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है—यही कारण है कि नड्डा से मुलाकात के बाद चर्चा और भी तेज हो गई है।



