स्वास्थ्य

केरल में भूजल संदूषण का खतरा लगातार बढ़ रहा है

केरल में भूजल संसाधनों को हाल के वर्षों में गंभीर खतरा उत्पन्न हुआ है। राज्य की लगभग 62% आबादी करीब 65 लाख खुले कुओं से भूजल पर निर्भर है, जो घरेलू जरूरतों के लिए आवश्यक है। जलवायु परिवर्तन से बारिश के पैटर्न में बदलाव, जनसंख्या घनत्व और अव्यवस्थित जल निकासी प्रणाली ने भूजल प्रदूषण को बढ़ावा दिया है।

भूजल प्रदूषण के कारण

राज्य में अनेक घरों में बिना वैज्ञानिक ढंग से बने सेप्टिक टैंक और गड्ढे खुले कुओं के नजदीक हैं, जिससे फैंकल प्रदूषण लगातार भूजल में घुस रहा है। हाल की एक 2024 की अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, राज्य की लगभग 7.4% आबादी खराब गुणवत्ता वाले भूजल पर निर्भर है। 252 स्थानीय स्वशासन निकायों में 59 लाख से अधिक लोग ऐसे भूजल का सेवन कर स्वास्थ्य जोखिम में हैं।

पाला में हाल ही में हुई जल गुणवत्ता जांच में मीना‍चिल नदी से जुड़े प्रभावित क्षेत्रों के 67% नमूनों में ई. कोलाई जीवाणु पाए गए हैं, जो पीने के पानी की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा रहे हैं। बाढ़ के बाद प्रदूषित सतही जल के भूजल में प्रवेश को इसकी मुख्य वजह माना जा रहा है।

भूजल प्रदूषण का हाल और स्वास्थ्य प्रभाव

अत्यधिक जनसंख्या और अव्यवस्थित नगरीकरण के चलते छोटे भूखंडों पर कई कुओं और सेप्टिक टैंक एक साथ बने हैं, जो भूजल को तेजी से प्रदूषित करते हैं। बारिश का अचानक भारी होना और जल निकासी की असमर्थता भी प्रदूषण की समस्या को गहरा रही है। भूजल मुख्यतः उथले जलस्रोतों से आता है जो सीधे बारिश से पुनर्भरित होते हैं। यदि आसपास की नदियाँ प्रदूषित हों तो भूजल भी दूषित होता है।

2018 में तिरुवनंतपुरम के एक शहरी क्षेत्र में 449 परिवारों पर किया गया जियोग्राफिक अध्ययन दिखाता है कि 77% कुआं सेप्टिक टैंक के 7.5 मीटर के भीतर थे और 73% कुओं में कोलिफॉर्म प्रदूषण की पुष्टि हुई। इस भूजल का पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, क्योंकि इसकी अम्लता अधिक थी।

राज्य में केवल लगभग 5-6% बड़े शहरी क्षेत्रों में केंद्रीकृत सीवर नेटवर्क मौजूद है। ज्यादातर स्थानों पर व्यक्तिगत सेप्टिक टैंक और गड्ढे गंदे पानी का निपटान करते हैं, जिसका वैज्ञानिक ढंग से निर्माण न होने के कारण जल स्रोत दूषित होते हैं।

भूजल प्रदूषण से पेयजल-संबंधी बीमारियाँ जैसे हेपेटाइटिस ए, शिगेलोसिस और नोरोवायरस की बार-बार सुनामी के रूप में बहाव हो रहे हैं। खासकर उत्तर के जिलों में इनका प्रकोप जारी है। एमबीएमए (एमीबिक मेनिंजिस) जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं ने भी राज्य में चिंता बढ़ाई है, जिसका मुख्य कारण गैर-कलोरीनयुक्त कुष्ठ जल का उपयोग है।

राज्य सरकार एएमआरयूटी 2.0 मिशन के तहत सीवर सिस्टम के आधुनिकीकरण के प्रयास कर रही है, लेकिन 2025 की CAG रिपोर्ट के अनुसार अभी तक मात्र 11.25% उपलब्धि ही हुई है। परियोजनाओं में वित्तीय और सामाजिक बाधाओं के कारण देरी हो रही है। इन कारणों के चलते केरल में भूजल प्रदूषण की समस्या अभी भी गहरी बनी हुई है।

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