Google Chrome कैसे बना? माइक्रोसॉफ्ट का डर, सर्च बॉक्स और सुंदर पिचाई की रणनीति; श्रीनिवास ने बताई अंदर की कहानी

Google Chrome origin story: गूगल क्रोम की उत्पत्ति गूगल की मजबूरी से हुई थी, जब माइक्रोसॉफ्ट के इंटरनेट एक्सप्लोरर से गूगल टूलबार हटने का खतरा था। परप्लेक्सिटी के अरविंद श्रीनिवास ने बताया कि सुंदर पिचाई की रणनीति ने गूगल को अपना ब्राउज़र बनाने पर मजबूर किया। ओमनीबॉक्स की अवधारणा ने सर्च और यूआरएल को एक साथ लाकर इंटरनेट के इस्तेमाल को बदल दिया, जिससे गूगल की सर्च ट्रैफिक और विज्ञापन आय कई गुना बढ़ी।
HighLights
- आखिर कैसे बना गूगल क्रोम?
- सुंदर पिचाई की क्या थी भूमिका?
- अरविंद श्रीनिवास ने बताई अंदर की कहानी
Google Chrome origin story: जब आप मोबाइल या लैपटॉप खोलते हैं और सीधे एड्रेस बार में कुछ भी टाइप कर देते हैं- खबर, वीडियो, सवाल या वेबसाइट तो आप अनजाने में एक ऐसी सोच का इस्तेमाल कर रहे होते हैं, जिसने इंटरनेट की दुनिया बदल दी। यही सोच आगे चलकर गूगल क्रोम (Google Chrome) की नींव बनी।
इस पूरी कहानी का खुलासा परप्लेक्सिटी के फाउंडर अरविंद श्रीनिवास (Arvind Srinivas Chrome story) ने किया। उनके मुताबिक, क्रोम ब्राउजर कोई अचानक आया प्रोडक्ट नहीं था, बल्कि यह गूगल (Google) की मजबूरी से पैदा हुआ फैसला था।
सर्च बॉक्स ही असली ताकत क्यों बना?
श्रीनिवास बताते हैं कि दुनिया की ज्यादातर सर्च ब्राउजर के एक ही बॉक्स से होती हैं- जिसे आज हम ओमनीबॉक्स (Omnibox Google Chrome) कहते हैं। पहले ब्राउजर में दो चीजें होती थीं:
- पहली- यूआरएल बार (URL Bar), जो वेबसाइट का पता डालने के लिए होती थी
- और दूसरी थी- गूगल टूलबार (Google Toolbar), जिसका इस्तेमाल सर्च करने के लिए होता है।
गूगल (Google) ने देखा कि अगर सर्च को सीधे ब्राउजर के अंदर ला दिया जाए, तो यूजर कहीं और जाएगा ही नहीं। इसी वजह से गूगल टूलबार (Google Toolbar) ने गूगल की सर्च ट्रैफिक और विज्ञापन कमाई को कई गुना बढ़ा दिया।
Microsoft से टकराव और बड़ा खतरा
लेकिन दिक्कत तब आई जब Microsoft ने Internet Explorer का ऐसा अपडेट लाने की तैयारी की, जिससे Google Toolbar हट सकता था और उसकी जगह MSN सर्च आ जाती।
श्रीनिवास के मुताबिक, यह Google के लिए खतरे की घंटी थी। अगर ब्राउजर किसी और के कंट्रोल में है, तो आपकी पूरी बिजनेस एक फैसले से खत्म हो सकती है।
सुंदर पिचाई की एंट्री और क्रोम की नींव
यहीं कहानी में अहम रोल निभाते हैं- सुंदर पिचाई। उस वक्त वह गूगल टूलबार प्रोजेक्ट से जुड़े थे। माइक्रोसॉफ्ट इस कदम के बाद गूगल ने तेजी से कंप्यूटर बनाने वाली कंपनियों (OEMs) से डील की, ताकि वे Internet Explorer का पुराना वर्जन चलाते रहें, जिसमें गूगल टूलबार (Google Toolbar) सुरक्षित था। इसी दौर में Google के अंदर एक बात साफ हो गई और वो थी-
“अगर कंट्रोल अपने हाथ में चाहिए, तो अपना ब्राउज़र बनाना ही होगा।”
और यहीं से जन्म हुआ गूगल क्रोम का। श्रीनिवास बताते हैं कि गूगल ने तय किया कि अब वह किसी और के ब्राउजर पर निर्भर नहीं रहेगा। इसी सोच से गूगल क्रोम बना। एक ऐसा ब्राउजर, जहां सर्च और URL एक ही बॉक्स में हों, तेज स्पीड हो और पूरा कंट्रोल गूगल के हाथ में हो। आज क्रोम ब्राउजर नहीं, बल्कि गूगल के पूरे इकोसिस्टम का गेटवे है।
गूगल पर 15 अरब क्वेरीज, 80% एड्रेस बार से
श्रीनिवास के मुताबिक, आज के समय में रोजाना करीब 15 अरब सर्च क्वेरीज़ गूगल (Google search queries daily) पर जाती हैं, और इनमें से लगभग 70-80% सर्च ब्राउजर के उसी बॉक्स से आती हैं जिसे हम एड्रेस बार कहते हैं।



