माता-पिता प्राइवेट स्कूलों के चक्रव्यूह में क्यों फंस जाते हैं

नई दिल्ली, इंडिया | 27 अप्रैल 2024
देश में शिक्षा प्रणाली में निजी स्कूलों की भूमिका तेजी से बढ़ी है, लेकिन साथ ही इससे जुड़ी कई समस्याएं भी सामने आ रही हैं। कई माता-पिता महसूस करते हैं कि वे प्राइवेट स्कूलों की उच्च फीस और नियमों के चलते एक तरह के फंसे हुए हालात में हैं। इस वजह से परिवार आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, निजी स्कूलों ने शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता और सुविधा की नई मिसालें स्थापित की हैं, परंतु अत्याधिक फीस और अडवांस्ड फीस स्ट्रक्चर ने परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ डाल दिया है। साथ ही, फीस वृद्धि के नियम की कमी से कई बार माता-पिता को बिना किसी वार्निंग के भारी फीस भरनी पड़ती है, जिससे तनाव बढ़ता है।
पांजा विद्यालयों के अभिभावक शिवा वर्मा ने बताया कि वे चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ें, परंतु कुछ प्राइवेट स्कूलों द्वारा अधिसूचित फीस में समय-समय पर हो रही बढ़ोतरी उनके लिए चिंता का विषय बन चुकी है। “हमारे जैसे आम परिवारों के लिए यह भुगतान मुश्किल हो जाता है,” उन्होंने कहा।
इसके अलावा, अभिभावकों को स्कूल के नियमों और प्रबंधन द्वारा लिए गए फैसलों में अक्सर पारदर्शिता की कमी का सामना करना पड़ता है। कई बार उन्हें ऐसा महसूस होता है कि वे अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति स्कूली प्राधिकरण के समक्ष पूरी तरह से वंचित हैं।
शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. रमेश कुमार बताते हैं कि निजी स्कूलों का स्वायत्तता का विस्तार आवश्यक है, लेकिन साथ ही सरकार को भी स्कूलों के फीस निर्धारण एवं गुणवत्ता नियंत्रण के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि तथा शिक्षा तक सबके पहुँच को सुनिश्चित किया जाए ताकि परिवारों को संतुलित और सुलभ विकल्प मिल सकें।
सरकारी स्तर पर भी कई प्रयास जारी हैं ताकि शिक्षा प्रणाली में सुधार हो और निजी व सरकारी स्कूलों के बीच संतुलन बना रहे। लेकिन फिलहाल, कई परिवार निजी स्कूलों से जुड़ी आर्थिक और मानसिक चुनौतियों के कारण दबाव में हैं और उन्हें इस स्थिति से निकालने के लिए ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है।
इस विषय पर आगे चर्चा और समाधान की दिशा में संगठित प्रयास आवश्यक हैं ताकि माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर बेफिक्र हो सकें और शिक्षा का सकारात्मक वातावरण बना रहे।



