एक ट्रोजन हॉर्स आईआईटी में घुस चुका है

नई दिल्ली, दिल्ली | 27 जून 2024
भारतीय तकनीकी संस्थान (IITs) के शैक्षिक और शोध ढांचे में भारतीय ज्ञान प्रणाली केंद्रों (Indian Knowledge System centres) द्वारा मिथक-आधारित सवालों को शामिल करने की योजना ने शिक्षा जगत में व्यापक चर्चा छेड़ दी है। यह कदम IITs के पारंपरिक विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के स्वरूप को बदलेगा और इस पर विभिन्न दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं।
भारतीय ज्ञान प्रणाली केंद्र, जो भारत सरकार के तहत काम करते हैं, का उद्देश्य है देश के प्राचीन ज्ञान और परंपरागत तकनीकों को आधुनिक शैक्षिक संस्थानों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करना। इन केन्द्रों का कहना है कि भारत के समृद्ध सांस्कृतिक और वैज्ञानिक इतिहास को आधुनिक शिक्षा में जगह देनी चाहिए जिससे छात्रों में राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक समझ विकसित हो सके।
लेकिन IITs जैसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान जहां विज्ञान, इंजीनियरिंग और अनुसंधान उच्च प्राथमिकता रखते हैं, वहां मिथक आधारित विषयों का समावेश कुछ विशेषज्ञों और शिक्षाविदों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। उनका मानना है कि तकनीकी शिक्षा को तथ्यात्मक, तर्कसंगत और प्रमाण आधारित रखना जरूरी है ताकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रभावित न हो।
शिक्षा विशेषज्ञ डॉ. विक्रम सिंह ने कहा, “यदि IITs के पाठ्यक्रम में बिना उचित वैज्ञानिक समीक्षा के मिथक और परंपरागत ज्ञान को शामिल किया गया तो इससे शोध और उन्नत तकनीकी विकास की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न उठ सकते हैं।” वहीं, कुछ सामाजिक वैज्ञानिक इस नए कदम को भारत के सांस्कृतिक ज्ञान का पुनरुद्धार बताते हुए इसे समय की आवश्यकता भी मानते हैं।
सरकार की ओर से यह भी जानकारी मिली है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केंद्रों के सुझावों पर IIT में बदलाव लाने से पहले व्यापक समवेत चर्चा और विशेषज्ञों की सहमति ली जाएगी। कहा जा रहा है कि यदि शामिल किया जाता है तो यह केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में होगा, न कि विज्ञान की जगह।
यह फैसला देश के तकनीकी शिक्षा भविष्य को प्रभावित कर सकता है, इसलिए सभी पक्षों का संतुलित दृष्टिकोण अपेक्षित है। IITs की उच्च शिक्षा गुणवत्ता को बरकरार रखते हुए सांस्कृतिक ज्ञान का समुचित समावेश कैसे संभव हो, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।



