अंतरराष्ट्रीय

80 साल बाद बदली जापान की रक्षा नीति, चीन क्यों मान रहा इसे अपने लिए बड़ा रणनीतिक खतरा?

नई दिल्ली, दिल्ली

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद जिस जापान ने दशकों तक शांतिवादी रक्षा नीति को अपनी पहचान बनाए रखा, वही देश अब अपनी सुरक्षा रणनीति में ऐतिहासिक बदलाव कर रहा है। सैन्य क्षमता बढ़ाने, रक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि करने और हथियारों के निर्यात की दिशा में उठाए गए कदमों ने पूर्वी एशिया की भू-राजनीति को नई बहस के केंद्र में ला दिया है। इन बदलावों पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया चीन की ओर से सामने आई है।

1945 के बाद जापान ने अपने संविधान के अनुच्छेद-9 के तहत युद्ध का रास्ता छोड़ते हुए सेना की भूमिका को आत्मरक्षा तक सीमित रखा। कई दशकों तक रक्षा खर्च अपेक्षाकृत कम रखा गया और हथियारों के निर्यात पर भी सख्त प्रतिबंध लागू रहे। यही नीति जापान की वैश्विक छवि का अहम हिस्सा बनी रही।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों ने जापान की रणनीति बदल दी है। चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी, ताइवान को लेकर बढ़ते तनाव, पूर्वी चीन सागर में विवाद और उत्तर कोरिया के लगातार मिसाइल परीक्षणों ने जापान को अपनी सुरक्षा तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है।

जापान अब अत्याधुनिक रक्षा तकनीकों, लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता और सहयोगी देशों के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास पर विशेष ध्यान दे रहा है। अमेरिका के साथ उसकी रणनीतिक साझेदारी भी पहले की तुलना में अधिक मजबूत होती दिखाई दे रही है।

चीन इन कदमों को केवल जापान की सुरक्षा नीति का हिस्सा नहीं मानता। बीजिंग का कहना है कि जापान का सैन्य विस्तार पूरे क्षेत्र में तनाव बढ़ा सकता है और इससे हथियारों की प्रतिस्पर्धा तेज होने की आशंका है। चीन बार-बार जापान के युद्धकालीन इतिहास का उल्लेख करते हुए उसे सैन्य मामलों में संयम बरतने की सलाह देता रहा है।

हालांकि जापान का स्पष्ट कहना है कि उसकी नई रक्षा नीति किसी भी देश के खिलाफ नहीं है। सरकार के अनुसार बदलते सुरक्षा माहौल में राष्ट्रीय हितों की रक्षा और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है।

रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि जापान की रक्षा नीति में हो रहे ये बदलाव आने वाले वर्षों में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की शक्ति संरचना, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर व्यापक असर डाल सकते हैं। ऐसे में पूरी दुनिया की नजर अब जापान की अगली रणनीतिक पहल पर बनी हुई है।

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