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BRICS Summit 2026: कांग्रेस में घमासान, चिदंबरम ने पूछा ‘क्या फायदा?’ थरूर बोले- भारत की बड़ी कूटनीतिक ताकत

नई दिल्ली, दिल्ली

नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन से पहले कांग्रेस के दो वरिष्ठ नेताओं के अलग-अलग बयान चर्चा में हैं। पी. चिदंबरम ने पिछले BRICS सम्मेलनों से भारत को मिलने वाले ठोस लाभ पर सवाल उठाया है, जबकि शशि थरूर ने भारत की मेजबानी और BRICS की भूमिका को देश की कूटनीतिक ताकत के रूप में पेश किया है।

चिदंबरम ने 10 सितंबर को कहा कि उन्हें पिछले दो-तीन BRICS शिखर सम्मेलनों से कोई ठोस लाभ या महत्वपूर्ण परिणाम दिखाई नहीं दिया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि भारत कई बहुपक्षीय संगठनों का हिस्सा है, लेकिन इन मंचों से देश को वास्तविक रूप से क्या हासिल हो रहा है, इसका मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है जब भारत BRICS की 2026 की अध्यक्षता कर रहा है और राजधानी में सम्मेलन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। चिदंबरम के बयान को लेकर बीजेपी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि पार्टी भारत की वैश्विक कूटनीतिक भूमिका को लेकर एकमत नहीं है।

इसके विपरीत, शशि थरूर ने BRICS की उपयोगिता को व्यापक रणनीतिक नजरिए से देखने की बात कही है। उनका मानना है कि BRICS भारत को ग्लोबल साउथ के देशों के साथ संवाद बढ़ाने का महत्वपूर्ण मंच देता है। भारत की मेजबानी में विभिन्न देशों के शीर्ष नेताओं का एक जगह आना भी नई दिल्ली के लिए कूटनीतिक अवसर माना जा रहा है।

BRICS का दायरा पिछले वर्षों में बढ़ा है। अब इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका के अलावा मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। आधिकारिक भारतीय आंकड़ों के मुताबिक 11 सदस्य देश मिलकर वैश्विक आबादी के 49.5 प्रतिशत, वैश्विक GDP के करीब 40 प्रतिशत और वैश्विक व्यापार के 26 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।

भारत की अध्यक्षता का फोकस लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता पर है। सरकारी जानकारी के मुताबिक अध्यक्षता के दौरान देश के 25 से अधिक शहरों में 350 से ज्यादा बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं।

हालांकि BRICS के भीतर मतभेद भारत के लिए बड़ी चुनौती हैं। मई में विदेश मंत्रियों की बैठक साझा बयान के बिना समाप्त हुई थी। पश्चिम एशिया के मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बन सकी और भारत को चेयर का बयान जारी करना पड़ा।

यही वजह है कि 12-13 सितंबर का सम्मेलन केवल भारत की मेजबानी का कार्यक्रम नहीं, बल्कि उसकी सहमति-निर्माण क्षमता की परीक्षा भी माना जा रहा है। सम्मेलन में व्यापार, निवेश, भुगतान व्यवस्था, तकनीक, वैश्विक शासन और विकास से जुड़े मुद्दों पर आगे बढ़ने की कोशिश होगी। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि BRICS को राजनीतिक चर्चा के मंच से आगे ले जाकर व्यावहारिक परिणामों से जोड़ा जाए। व्यापार संगठनों ने भी सम्मेलन से निर्यात, निवेश, तकनीक और भुगतान व्यवस्था में ठोस लाभ हासिल करने की उम्मीद जताई है।

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