वैज्ञानिक कवकों के खिलाफ रासायनिक ‘हथियारों की दौड़’ पर पुनर्विचार कर रहे हैं

फंगल संक्रमण लंबे समय से खुजली, त्वचा और नाखूनों के रंग बदलने तथा बाल झड़ने जैसी समस्याओं से जुड़ा हुआ रहा है। ये लक्षण डर्मेटोफाइटोसिस नामक बीमारी के हिस्से हैं, जो डर्मेटोफाइट्स नामक कवकों के समूह से होती है।
चंडीगढ़ के पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) के मेडिकल माइकोलॉजी प्रोफेसर शिवप्रकाश रुद्रमूर्ति ने बताया कि कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीजों को पूरे शरीर पर घाव हो सकते हैं, जिनकी वजह से कभी-कभी वे सुसाइडल विचारों तक पहुंच जाते हैं।
वैश्विक तापमान वृद्धि और कवक संक्रमण
डर्मेटोफाइट्स मोल्ड्स होते हैं जो लंबे रेशों में बढ़ते हैं, जबकि खमीर (yeast) एकल, अंडाकार कोशिकाएं होती हैं। ICU में तेजी से उभरने वाला मल्टीड्रग रेसिस्टेंट पैथोजन Candida auris खून में प्रवेश कर गंभीर संक्रमण पैदा करता है, जिनका ज्यादातर एंटीफंगल इलाज कारगर नहीं होता। PGIMER के प्रोफेसर रुद्रमूर्ति के अनुसार, इससे संक्रमितों में 30-40% मृत्यु दर पाई जाती है।
Candida auris पहली बार 2009 में जापान में रिपोर्ट हुआ था। आधिकारिक कारण अभी तक अध्ययनाधीन है, लेकिन यह माना जाता है कि वैश्विक तापमान बढ़ने से ज्यादा गर्मी सहने वाले कवक जीवित रह पा रहे हैं। क्योंकि कवक 30 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान वाले नमी वाले पर्यावरण में बेहतर बढ़ते हैं, पहले वे हमारे शरीर के 37 डिग्री ताप पर जीवित नहीं रह पाते थे।
क्लिनिकल अध्ययन और उपचार में चुनौतियां
PGIMER ने 25 साल पहले फंगल पैथोजेन संग्रह शुरू किया, और अब उनके पास भारत भर से 15,000 फंगल क्लिनिकल आइसोलेट्स का संग्रह है। ये संग्रह अन्य चिकित्सा केंद्रों को निशुल्क मदद देते हैं।
जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च, बैंगलोर के कौस्तव सन्याल और उनके सहयोगी अस्वथी नारायणन ने PGIMER के Candida auris आइसोलेट्स पर शोध किया और पाया कि 90% से अधिक क्लिनिकल आइसोलेट्स सामान्य एजोल एंटीफंगल दवाओं जैसे फ्लुकोनाजोल के प्रति प्रतिरोधी हैं।
30% आइसोलेट्स पॉलीन क्लास की दवाओं के विरुद्ध भी प्रतिरोध दिखाते हैं, परन्तु अधिकांश को एकिनोकैंडिन्स नामक दूसरा वर्ग अभी भी प्रभावी रहता है। डीएनए विश्लेषण से पता चला कि जागरूकता बढ़ाने वाले जीन की प्रतिलिपि में वृद्धि और कुछ जीनों में उत्परिवर्तन प्रतिरोध के कारण हो सकते हैं।
अधिकांश एंटीफंगल दवाएं कवक की कोशिका झिल्ली तथा दीवार को लक्षित करती हैं। फ्लुकोनाजोल जैसे एजोल दवा के सामने कवक ज्यादा Erg11 जीन कॉपी बनाकर फिर से एर्गोस्टेरोल का उत्पादन बढ़ाता है जिससे दवा विफल होती है। इसी प्रकार, एकिनोकैंडिन्स के विरुद्ध Fks1 जीन में उत्परिवर्तन होने पर कवक वे दवाएं सहन कर पाता है।
चिकित्सकों को इन जीन बदलावों को ध्यान में रखते हुए परख सीमाएं बढ़ानी चाहिए और चिकित्सीय दवा की मात्रा को अनुकूलित करना चाहिए। यह कदम संक्रमण के इलाज में सुधार कर सकता है। वैज्ञानिक इस पर भी ध्यान दे रहे हैं कि क्यों अत्यधिक दवाओं के उच्च मात्रा में भी कवक जीवित रह पाता है, इसे “ईगल एफेक्ट” कहा जाता है, जो कवक के सेल वॉल में चिटिन उत्पादन बढ़ने के कारण होता है।
प्रोफेसर सन्याल बताते हैं कि औषधि संयोजन चिकित्सा और सेलुलर पारिस्थितिक तंत्र के लक्षित इलाज की आवश्यकता है ताकि दवाओं का प्रभावी उपयोग किया जा सके। CSIR-CCMB के डॉ. वरहन सुझाव देते हैं कि कमजोर पथवे पर हमला करना बेहतर होगा जिससे कवक पूरी तरह जीवित रह सके पर रोग न फैला सके। इस नई सोच के साथ कवकों से लड़ाई में उपयोग की जाने वाली रणनीतियां बदल सकती हैं।




