छत्तीसगढ़

जब माओवादियों की गोली पर भारी पड़ी स्थानीय बोली और पलट गई बस्तर की बाजी; पूरी कहानी

बस्तर में माओवादियों के खिलाफ लड़ाई में स्थानीय बोलियों (गोंडी, हल्बी) और संवाद रणनीति ने बंदूक से अधिक प्रभाव दिखाया है। पुलिस अधीक्षक रॉबिंसन गुरिया जैसे अधिकारी ग्रामीणों से जुड़ने के लिए स्थानीय जवानों का उपयोग कर रहे हैं।

HighLights

  1. स्थानीय बोलियों (गोंडी, हल्बी) से संवाद बना मुख्य हथियार।
  2. पिछले दो वर्षों में 2,700 से अधिक माओवादियों का आत्मसमर्पण।
  3. स्थानीय भाषा में संवाद ने पुलिस-ग्रामीणों के बीच पुल बनाया।

 अबूझमाड़ के घने जंगलों में हाल ही में खुले पांगुड़ कैंप के बाहर बेरेलटोला गांव की एक शांत दोपहर। पुलिस अधीक्षक रॉबिंसन गुरिया ग्रामीणों से संवाद शुरू करते हैं, लेकिन उनकी बात तब तक पूरी नहीं होती, जब तक पास खड़ा जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) का जवान कचलाम उसे गोंडी में दोहरा नहीं देता।

ग्रामीणों की आवाज भी उसी के माध्यम से हिंदी में लौटती है। यह दृश्य छोटा जरूर है, लेकिन बस्तर की बड़ी सच्चाई को उजागर करता है कि यहां सुरक्षा की असली चाबी बंदूक नहीं, बल्कि संवाद है। इसी सच्चाई को समझते हुए सुरक्षाबलों ने अपनी रणनीति बदली। सरकारी योजनाएं, पुनर्वास अभियान और सामुदायिक कार्यक्रम अब स्थानीय बोली यानी गोंडी-हल्बी में समझाए जाते हैं।

सुरक्षा की लड़ाई का निर्णायक मोड़ संवाद से आया है। जब तक स्थानीय समाज की भाषा, संस्कृति और मनोविज्ञान को नहीं समझेंगे, स्थायी शांति संभव नहीं। स्थानीय युवाओं की भर्ती से इंटेलिजेंस मजबूत हुआ है और सुरक्षाबलों पर भरोसा भी बढ़ा है।
– सुंदरराज पी., बस्तर आईजीपी

धीरे-धीरे ‘बोली की कटार’ ने बंदूक की धार को कुंद करना शुरू कर दिया। यह इतना असरकारी रहा कि पिछले दो साल में 2,700 से अधिक माओवादियों की घर वापसी हुई है। बीजापुर जिले के एसपी जितेंद्र यादव कहते हैं कि बंदूकें जंग जीत सकती हैं, लेकिन मन नहीं।

70 प्रतिशत आदिवासी नहीं बोलते हिंदी

स्थानीय बोली-भाषा के विशेषज्ञ डॉ. गंगाराम धुर बताते हैं कि दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर के अंदरूनी इलाकों में लगभग 70 प्रतिशत लोग हिंदी नहीं बोलते। गोंडी, हल्बी, भतरी और धुरवी ही उनके जीवन का आधार हैं। चार दशक पहले जब माओवादी बस्तर पहुंचे, तो उन्होंने इस खाई को अवसर में बदला।

स्थानीय संस्कृति, लोकगीत और नाट्य मंडलियों के जरिए गांवों में पैठ बनाई। चेतना नाट्य मंडली जैसे मंचों ने ‘जल-जंगल-जमीन’ का संदेश स्थानीय बोली में दिया। सीआरपीएफ के पूर्व अधिकारी राजू बाघ के अनुसार, माओवादियों ने समझ लिया था कि बंदूक से ज्यादा प्रभावकारी बोली है। पीपुल्स लिब्रेशन गुरिल्ला आर्मी (पीएलजीए) के गठन के बाद भी सांस्कृतिक संगठन सक्रिय रहे।

चल रहे 10 से अधिक अभियान

आदिवासियों का भरोसा जीतने बस्तर में प्रदेश सरकार के अलावा जिला स्तर पर स्थानीय बोलियों में अभियान चलाए जा रहे हैं। इससे ग्रामीणों से संवाद स्थापित हुआ। ‘पुना मारगेम’ (पुनर्वास से पुनर्जीवन), ‘नियद नेल्ला नार’ (हमारा अच्छा गांव), ‘मावा केतुल’ (हमारा पुलिस घर), ‘मनवा पुलिस मनवा नाटे’ (चलित थाना), ‘लोन वर्राटू’ (घर आओ) और ‘मनवा नवा नार’ (हमारा नया गांव) जैसे अभियानों ने सुरक्षा बल और ग्रामीणों के बीच संवाद के पुल को मजबूत किया है।

आकाशवाणी से मार्मिक अपील

ऐसे दुर्गम इलाके, जहां न सड़कें है, ना मोबाइल नेटवर्क, वहां आकाशवाणी की आवाज जंगलों तक पहुंची। पांच से 25 फरवरी तक चले अभियान में गोंडी और हल्बी में माओवादियों के स्वजन ने उनसे मुख्यधारा में लौटने की मार्मिक अपील की। इस पहल को जमीन पर मजबूती देने के लिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने सामुदायिक पुलि¨सग कार्यक्रम के तहत 10 हजार रेडियो भी बांटे थे।

प्रभावी रही गोंडी भाषी जवानों की भर्ती

2010 में ताड़मेटला हमले में 76 जवानों के बलिदान ने सुरक्षा तंत्र को आत्ममंथन के लिए मजबूर किया। विश्लेषण में स्पष्ट हुआ कि स्थानीय इंटेलिजेंस का अभाव बड़ी कमजोरी है और इसकी जड़ भाषा में है। इसके बाद भर्ती नियमों में ढील दी गई। बस्तर के युवाओं के लिए पांचवीं पास योग्यता तय की गई, कद में छूट दी गई और एसपीओ (स्पेशल पुलिस आफिसर), बस्तर फाइटर व डीआरजी जैसे स्थानीय बल खड़े किए गए। बीते दशक में करीब 12 हजार जवान भर्ती हुए, जिनमें से लगभग 60 प्रतिशत गोंडी भाषी हैं।

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