घटना से ‘आश्चर्यचकित’ सुप्रीम कोर्ट ने आज़माइश पुलिस कमिश्नर और जांच अधिकारी को 13 अप्रैल को तलब किया

गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने राज्य पुलिस और दो निजी अस्पतालों की कड़ी निंदा की है, जिन्होंने कथित तौर पर नाबालिग लड़की के साथ हुए बलात्कार के बाद उसकी स्थिति गंभीर होने पर उपचार देने से मना कर दिया। लड़की की मौत के बाद यह मामला सियासी और सामाजिक स्तर पर गरमा गया है।
CJI ने अपनी तीखी टिप्पणी में पुलिस और अस्पतालों की ‘पूरी उदासीनता’ और ‘संवेदनहीन रवैये’ पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि ऐसे रवैये का मतलब है कि पीड़ित की जान को गंभीरता से नहीं लिया गया और नैतिक जिम्मेदारी को नजरअंदाज किया गया।
पुलिस विभाग पर आरोप है कि उन्होंने मामले को गंभीरता से नहीं लिया और जांच में लापरवाही बरती गई। वहीं, निजी अस्पतालों ने आपातकालीन मामले में इलाज करने से इंकार कर दिया, जिससे मामला और भी संवेदनशील हो गया। डॉक्टरों की इस निरा जवाबदेही से पीड़ित परिवार में गहरी आक्रोश व्याप्त है।
रिपोर्टों के अनुसार, पीड़ित लड़की ने अस्पताल में क्रिटिकल कंडीशन में सहायता मांगी, लेकिन अस्पताल ने मरीज को उचित इलाज देने में देरी की। इसके बाद लड़की की मौत हो गई, जिससे पूरे देश में न्याय के लिए आवाजें उठने लगीं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस कमिश्नर और जांच अधिकारी को 13 अप्रैल को कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि दोषियों को तुरंत न्याय दिलाया जाना चाहिए और पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा मिलना चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं हमारी सामाजिक और न्यायिक प्रणाली में सुधार की आवश्यकता दर्शाती हैं। बच्चों के प्रति सुरक्षा कवच मजबूत करने की दिशा में प्रशासन को कड़े कदम उठाने होंगे।
इस बीच, राजनीतिक दल और मानवाधिकार संगठन इस मामले को लेकर सक्रिय हो गए हैं और न्याय दिलाने की मांग कर रहे हैं। गाज़ियाबाद पुलिस भी जांच प्रक्रिया को तेज करते हुए दोषियों को चिन्हित करने और सजा दिलाने की बात कर रही है।
घटना ने समाज के प्रत्येक स्तर पर चिंता और गंभीर विचार विमर्श को जन्म दिया है कि कैसे हमारी समाज व्यवस्था कमजोर बनी हुई है और पीड़ितों को न्याय के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है। न्यायपालिका की सक्रियता से उम्मीद जगी है कि दोषी बख्शे नहीं जाएंगे।



