ED ने Indo-Myanmar सीमा से विदेशी सुपारी तस्करी में जुड़े 16 स्थानों पर छापे लगाए

एन्फोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ED) ने इंडो-म्यामार सीमा के रास्ते भारत में विदेशी मूल की सुपारी (अरेका नट) की तस्करी से जुड़ी 16 जगहों पर कार्रवाई की है। इस कार्रवाई के दौरान कुशल रूप से इस अवैध व्यापार से जुड़े ठिकानों की खोज की गई।
तस्करी का नेटवर्क और स्थानिक विस्तार
यह छापेमारी असम के गुवाहाटी तथा पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी, बागडोगरा, फांसीदेवा और कूच बिहार में हुई। जिन स्थानों पर तलाशी ली गई, वे DNG Biotech Private Limited, Jai Karni Tradings Private Limited, Purvottar Agro Private Limited, N.R. Associates और संबंधित व्यक्तियों से जुड़े हुए थे। इसके अलावा लगभग 95 लाख रुपये की अवैध नकदी जब्त की गई और 85 लाख रुपये के फिक्स्ड डिपॉजिट फ्रीज कर दिए गए।
ED की जांच पुलिस द्वारा असम और पश्चिम बंगाल में दर्ज 11 एफआईआर पर आधारित है। मामलों में इंडोनेशियन, थाई और बर्मी मूल की सुपारी की तस्करी, परिवहन और बिक्री का आरोप है। ये खेप मिजोरम के रास्ते म्यामार से भारत में लाई जाती थीं और फिर पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों में जाली जीएसटी इनवॉइस और ई-वे बिल के जरिए भेजी जाती थीं।
सुपारी तस्करी की प्रमुख गुत्थी
ED ने इसे एक “सुस्थित” तस्करी रैकेट बताया है। बताया गया कि सूखी सुपारी की खेपें मिजोरम में चांफाई के बराबर इंडो-म्यामार सीमा से लाकर छोटे-छोटे हिस्सों में जियाखोटर के टीआउ नदी पार कर ले जाया जाता था, जिससे भूमि सीमा शुल्क स्टेशन को बाईपास किया जाता था। म्यामार के एजेंट भारतीय पक्ष के फ्रंट कंपनियों को यह खेप बेचते थे।
इस रैकेट की कंपनियां स्थानीय चांफाई निवासियों की नाम पर रजिस्टर्ड थीं, लेकिन उनके जीएसटी और बैंक खाते सिलचर (असम) के लोगों द्वारा संचालित और नियंत्रित किए जाते थे। चांफाई में सुपारी उत्पादन का कोई रिकॉर्ड नहीं है और मिजोरम में पहले सुपारी सुखाने या प्रोसेसिंग की कोई इकाई नहीं थी।
ED के अनुसार, खेपें जियाखोटर के जरिए चांफाई में एकत्र की जाती थीं और फिर वायरेन्टे के रास्ते सिलचर भेजी जाती थीं। इन खेपों को मिजोरम और असम की शेल कंपनियों के बीच बिक्री के रूप में दिखाया जाता था, जिसमें सुपारी को भारतीय मूल का बताया गया था। ये कंपनियां कानून के शिकंजे में आने पर बंद कर दी जाती थीं और नई कंपनियों से बदली जाती थीं।
सिलचर से खेपें गुवाहाटी के आसपास गोदामों तक लाई जाती थीं, जहां उन्हें फिर से पैक और दस्तावेज बनाए जाते थे। ED ने कहा कि इस परिवहन का प्रबंध बिकानेर असम रोडलाइंस इंडिया लिमिटेड नामक कंपनी और इसके संबंधीत संगठनों द्वारा किया जाता था, जिनके प्रमुख सुषिल डागा थे, जिनके प्रेसेस पर जुलाई 3 को भी छापेमारी हुई थी।
यह सुपारी सिलीगुड़ी कॉरिडोर के माध्यम से उत्तर बंगाल और फिर अन्य राज्यों की कंपनियों तक पहुंचाई जाती थी, जहां यह गुटका और पान मसाला निर्माताओं को कस्टम शुल्क से कम कीमत पर बेची जाती थी। सिलीगुड़ी नेटवर्क हर महीने वाहकों से सुरक्षा के बदले पैसा इकठ्ठा करता था ताकि खेपों को बिना रोक-टोक पहुंचाने की सुविधा मिल सके।
ED ने कहा कि राशि विभिन्न खातों से परिवार के सदस्यों, कर्मचारियों और शेल कंपनियों के नाम पर चलित खातों में भेजी जाती, फिर बड़ी नकद निकासी होकर हवाला चैनलों के जरिए भटकाई जाती। अपराध से अर्जित धन का निवेश अचल संपत्तियों, वाहनों और अन्य संपत्तियों में हुआ है, और 1,000 करोड़ रुपये से अधिक बैंक जमा संबंधी जानकारी मिली है।




