राष्ट्रीय

भारतीय वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि: अरब सागर की गहराई में मिली स्केट मछली की नई प्रजाति

कोच्चि, केरल

भारत के समुद्री जैव-विविधता अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआइ) के वैज्ञानिकों ने आइसीएआर-केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के साथ मिलकर अरब सागर में स्केट मछली की एक नई प्रजाति की पहचान की है। नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम डिप्टुरस धृतिया रखा गया है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक इस प्रजाति के नमूने केरल तट और वेज बैंक क्षेत्र के पास समुद्र में 400 से 600 मीटर की गहराई पर मिले। यह गहरे समुद्र में रहने वाली प्रजाति है और इसकी अधिकतम ज्ञात लंबाई 131.5 सेंटीमीटर तक दर्ज की गई है। इसकी पूंछ पर कांटों की पांच स्पष्ट कतारें इसकी प्रमुख पहचान हैं।

गहरे समुद्र में चल रहे सर्वेक्षण से सामने आई प्रजाति

जेडएसआइ के अनुसार यह खोज पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के गहरे महासागर मिशन के तहत चल रही ‘भारत के गहरे समुद्री कान्ड्रिक्थियंस : वर्गीकरण, वितरण, जीव विज्ञान और वर्तमान स्थिति’ परियोजना के दौरान किए गए समुद्री सर्वेक्षण में सामने आई।

वैज्ञानिकों ने प्रजाति की पहचान के लिए उसके शारीरिक लक्षणों का अध्ययन करने के साथ आनुवंशिक परीक्षण भी किया। इसके पूरे माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम का अनुक्रमण किया गया। जांच के दौरान पता चला कि यह ट्रावनकोर स्केट यानी डिप्टुरस जोहानिसडेविसी से अलग प्रजाति है।

दोनों के आनुवंशिक अनुक्रम में 3.8 से 4.7 प्रतिशत तक अंतर पाया गया। इस आनुवंशिक अंतर और अन्य वैज्ञानिक विशेषताओं के आधार पर इसे अलग प्रजाति के रूप में मान्यता दी गई।

40 साल से अधिक समय तक गलत पहचान

शोधकर्ताओं के लिए यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि डिप्टुरस धृतिया को चार दशक से अधिक समय तक डिप्टुरस स्प्रिंगेरी समझा जाता रहा। इस अवधि में गहरे समुद्र में झींगा पकड़ने वाले व्यावसायिक ट्रालरों के जाल में यह प्रजाति अनजाने में भी पकड़ी जाती रही।

वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्री प्रजातियों की सही पहचान संरक्षण के लिए बेहद जरूरी है। गहरे समुद्र में रहने वाली शार्क, रे और स्केट जैसी प्रजातियों की प्रजनन दर अपेक्षाकृत कम होती है। इनकी आबादी को दोबारा सामान्य होने में लंबा समय लग सकता है। इसके अलावा व्यावसायिक मत्स्य गतिविधियों के दौरान इनके अनजाने में पकड़े जाने का खतरा भी रहता है।

पहली महिला निदेशक के सम्मान में रखा नाम

नई प्रजाति का नाम जेडएसआइ की पहली महिला निदेशक डॉ. धृति बनर्जी के सम्मान में डिप्टुरस धृतिया रखा गया है। डॉ. बनर्जी ने कहा कि गहरे समुद्र का बड़ा हिस्सा अभी भी वैज्ञानिक खोज से अछूता है और समुद्री सर्वेक्षण जैव-विविधता को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

शोध दल में जेडएसआइ के डॉ. केके बिनीश और अनिल कासीनाथ, आइसीएआर-केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान के अखिलेश केवी तथा अमेरिका के डॉ. डेविड ए. एबर्ट शामिल रहे।

इसी अभियान के तहत शोधकर्ताओं ने भारत के विशेष आर्थिक क्षेत्र में कोल्लम स्लोप महत्वपूर्ण शार्क एवं रे क्षेत्र की पहचान और मानचित्रण भी किया है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Please enter comment in Japanese. (Anti-spam)

Back to top button
error: Content is protected !!