डॉक्टरों की सुरक्षा पर बड़ा खुलासा: हर 10 में से 6 ने अस्पताल में झेली हिंसा, 48% मामलों की नहीं हुई शिकायत

नई दिल्ली, दिल्ली
देश में डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर सामने आई एक स्टडी ने स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी गंभीर चिंता को उजागर किया है। इंडियन जर्नल ऑफ ऑक्यूपेशनल एंड एनवायरनमेंटल मेडिसिन में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक साल के दौरान करीब 60.9 प्रतिशत डॉक्टरों ने अपने कार्यस्थल पर किसी न किसी रूप में हिंसा का सामना किया। इनमें से लगभग 48 प्रतिशत मामलों की अधिकारियों से शिकायत तक नहीं की गई।
स्टडी के मुताबिक, शिकायत नहीं करने के पीछे डॉक्टरों में कार्रवाई न होने का डर, घटना को गंभीरता से नहीं लिए जाने की आशंका और अन्य व्यावहारिक कारण प्रमुख रहे। यह स्थिति अस्पतालों में डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है।
इलाज से असंतोष और कहासुनी बनी हिंसा की प्रमुख वजह
रिपोर्ट में बताया गया है कि अस्पतालों में हिंसा की प्रमुख वजहों में इलाज को लेकर असंतोष और मरीज के परिजनों के साथ कहासुनी शामिल रही। कई मामलों में इलाज के परिणाम को लेकर नाराजगी बढ़ने के बाद विवाद हिंसक स्थिति में बदल गया।
सबसे अधिक घटनाएं अस्पताल के उन हिस्सों में सामने आईं जहां गंभीर मरीजों का इलाज किया जाता है। इनमें ऑपरेशन थिएटर (OT) और इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) प्रमुख रहे।
इन क्षेत्रों में हिंसा के मामले ज्यादा
- ओटी (OT): 88.8 प्रतिशत
- आईसीयू (ICU): 85.3 प्रतिशत
- इमरजेंसी: 68.6 प्रतिशत
- वार्ड: 46.6 प्रतिशत
- ओपीडी (OPD): 42.6 प्रतिशत
आंकड़ों से संकेत मिलता है कि मरीजों की गंभीर स्थिति, इलाज को लेकर परिजनों की चिंता और आपात परिस्थितियां अस्पतालों में तनाव बढ़ाने वाले प्रमुख कारक हो सकते हैं।
सरकारी डॉक्टरों में हिंसा का आंकड़ा ज्यादा
स्टडी में सरकारी और निजी क्षेत्र के डॉक्टरों के अनुभवों में भी अंतर सामने आया। 63.5 प्रतिशत सरकारी डॉक्टरों ने कार्यस्थल पर हिंसा का सामना करने की बात कही, जबकि निजी क्षेत्र में यह आंकड़ा 56.9 प्रतिशत रहा।
लिंग के आधार पर देखें तो पुरुष डॉक्टरों में हिंसा का अनुभव करने वालों का अनुपात 64.7 प्रतिशत, जबकि महिला डॉक्टरों में यह 52.9 प्रतिशत रहा।
तीन साल में 100 हमलों का जिक्र
डॉक्टरों पर हमलों से संबंधित एक अलग अध्ययन में तीन वर्षों के दौरान करीब 100 घटनाओं का उल्लेख किया गया है। इनमें लगभग आधे मामले छह राज्यों से सामने आए।
- महाराष्ट्र: 15 मामले
- केरल: 9 मामले
- पंजाब: 8 मामले
- दिल्ली: 7 मामले
- कर्नाटक: 6 मामले
- उत्तर प्रदेश: 6 मामले
इन आंकड़ों से पता चलता है कि डॉक्टरों पर हिंसा का मुद्दा किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए कानून की मांग
डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा को लेकर केंद्र और राज्यों में लंबे समय से चर्चा होती रही है। वर्ष 2019 में डॉक्टरों की सुरक्षा से संबंधित एक मसौदा भी सामने आया था, जिसमें गंभीर चोट पहुंचाने जैसी घटनाओं के लिए 10 साल तक की जेल और 10 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रस्ताव रखा गया था।
हालांकि, वर्ष 2023 में केंद्र सरकार ने डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए अलग केंद्रीय कानून बनाने की मांग को स्वीकार नहीं किया। ऐसे में अस्पतालों में हिंसा की बढ़ती घटनाओं और बड़ी संख्या में मामलों की रिपोर्टिंग नहीं होने के बीच डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है।



