आस्था और परंपरा का संगम: नवरात्र में अखंड ज्योतियों से जगमगा उठते हैं छत्तीसगढ़ के मंदिर

चैत्र नवरात्र में छत्तीसगढ़ के देवी मंदिर अखंड ज्योतियों से जगमगा उठते हैं। यह परंपरा व्यक्तिगत आस्था के साथ सामुदायिक भागीदारी का प्रतीक है।
HighLights
- छत्तीसगढ़ के मंदिर चैत्र नवरात्र में अखंड ज्योतियों से जगमगाते हैं
- यह परंपरा व्यक्तिगत आस्था और सामुदायिक भागीदारी का प्रतीक है
- डोंगरगढ़, दंतेवाड़ा, रतनपुर में हजारों ज्योतियां प्रज्वलित होती हैं
शक्ति उपासकों की धरती में लोक आस्था और क्षेत्रीय संस्कृति का अद्भुद मिश्रण विकसित हुआ है। चैत्र नवरात्र में छत्तीसगढ़ के देवी मंदिर जगमग हो उठे हैं। गांव के देवी स्थान से लेकर प्रदेश के मुख्य मंदिरों तक में लगातार नौ दिनों तक अखंड ज्योत की परिकल्पना में व्यष्टि से समष्टि का भाव दिखता है।
वैदिक और पौराणिक ही नहीं, ग्रामीण व आदिवासी परंपरा में भी अग्नि पवित्र शक्ति है। कौन किसके लिए प्रेरक बना, यह तय करना कठिन है परंतु ज्योत से ज्योत जली और अब पूरे प्रदेश की परंपरा है। यह व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता के साथ ही सामुदायिक और सामाजिक भागीदारी का प्रतीक है। यह मनोकामना की ज्योत है।

मंदिरों में जगमगाते मिट्टी के ज्योत
मंदिरों में जगमगाते मिट्टी के ज्योतों में अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, अगड़ा-पिछड़ा, अपना-पराया जैसा कोई भेद नहीं है। घरों में अखंड ज्योत जलाने वालों ने अपने लिए यहां भी ज्योत जलवा रखी है। दूसरी तरफ जो घर में पूरी शुद्धता और शुचिता के साथ पूजा-पाठ, साधना-अराधना में स्वयं को सक्षम नहीं पाते, उनका दीपक भी मंदिर की पंक्तिपद्ध ज्योतों में शामिल है। मंदिर के प्रतिनिधि चौबीसों घंटे बारी-बारी से सुनिश्चित करते हैं कि कोई भी अखंड ज्योत खंडित नहीं हो।
महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित डोंगरगढ़ की पहाड़ी चैत्र और शारदीय नवरात्र में ज्योतों से जगमग हो जाती है। मुंबई-हावड़ा मुख्य रेल मार्ग पर यात्रा करते हुए श्रद्धालुओं की आंखें माता के दर्शन के लिए आम दिनों में भी बेचैन रहती हैं। मान्यता है कि राजा विक्रमादित्य के काल से (लगभग 2,200 वर्ष पूर्व से) माता बमलेश्वरी के रूप में विराजित माता बगलामुखी का यह प्रभाव क्षेत्र है।

(रायपुर शहर में आकाशवाणी के पास स्थित काली मंदिर में ज्योत जलाते हुए श्रद्धालु। फाइल फोटो)
कलचुरी और मराठा काल में स्थापित मंदिरों में भी नियमित शक्ति पूजा के साथ अखंड ज्योति की परंपरा के प्रमाण मिलते हैं। दंतेवाड़ा की माता दंतेश्वरी तथा रायपुर और बिलासपुर की महामाया, चंद्रपुर में चंद्रहासिनी सहित सभी देवी स्थानों में सामूहिक ज्योत अपना व्यैक्तिक संकल्प व मनोकामना तथा सामाजिक भागीदारी के पर्याय हैं। मंदिरों में ज्योत के लिए विशेष कमरे विकसित किए गए हैं।
परंपरा में भागीदारी को इससे भी समझा जा सकता है कि बिलासपुर के रतनपुर स्थित महामाया मंदिर में ही करीब 25 हजार ज्योत जलती हैं। समय और सक्षमता वृद्धि के साथ मनोकामना ज्योतों की संख्या भी प्रति वर्ष बढ़ती जा रही है। राजधानी रायपुर के 20 से अधिक प्रमुख देवी मंदिरों में एक लाख से अधिक अखंड ज्योत जलती हैं। श्रद्धालु इसके लिए पंजीयन कराते हैं।
विदेशी श्रद्धालु भी कराते हैं पंजीयन
मंदिरों में ज्योत जलाने के लिए श्रद्धालुओं को पंजीयन कराना पड़ता है। उनकी पंजीयन संख्या के आधार पर ज्योत के लिए दीपक को स्थापित किया जा सकता है। श्रद्धालु ज्योतों की परिक्रमा करने के साथ अपने ज्योत के भी दर्शन करते हैं। विदेश में रहने वाले श्रद्धालु भी योगदान कर अपने व स्वजन के नाम से ज्योत जलवाते हैं।

चैत्र नवरात्र में ज्योत के साथ जवारा भी बोया जाता है, जिसका नवरात्र के अंतिम दिन विसर्जन होता है। वहां प्रतिदिन शाम को जसगीत और भक्ति गीतों से मां दुर्गा की उपासना की जाती है। बंजारी माता मंदिर के ट्रस्टी हरीश जोशी बताते हैं कि श्रद्धालु मनोकामना के लिए ज्योत जलवाते हैं।
कई लोग मनोकामना पूर्ण होने पर जलवाते हैं तो कुछ श्रद्धालु मन्नत मांगने के साथ ही ज्योत जलवाना शुरू कर देते हैं। एक ज्योति कलश के लिए 700 रुपये से लेकर एक हजार रुपये तक योगदान करना होता है।
51 शक्तिपीठों में दंतेश्वरी माता
दंतेवाड़ा जिले की देवा मां दंतेश्वरी का प्राचीन मंदिर डंकनी-शंखनी नदियों के संगम पर स्थित है। इसे 51 शक्तिपीठों में एक माना जाता है। मान्यता है कि यहां पर सती का दांत गिरा था।



