अंतरराष्ट्रीय

AI ने बढ़ाई वैज्ञानिकों की मुश्किलें, लाखों नकली रेफरेंस रिसर्च पेपर्स में शामिल

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तेजी से बढ़ती ताकत अब वैज्ञानिक शोध के लिए चुनौती बनती नजर आ रही है। एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि AI टूल्स की वजह से करीब 1.5 लाख फर्जी साइटेशन्स वैज्ञानिक साहित्य में शामिल हो चुके हैं। इससे दुनियाभर के शोध संस्थानों और जर्नल्स में चिंता का माहौल है।

यह अध्ययन अमेरिका की कई प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटीज के शोधकर्ताओं ने मिलकर किया। शोध में पता चला कि AI टूल्स द्वारा तैयार किए गए कई संदर्भ ऐसे थे, जिनका कोई वास्तविक स्रोत मौजूद ही नहीं था। इसके बावजूद वे वैज्ञानिक पेपर्स में प्रकाशित हो गए।

शोधकर्ताओं ने 2020 से 2025 तक के लगभग 25 लाख शोधपत्रों का अध्ययन किया। इसमें 11 करोड़ से अधिक साइटेशन्स की जांच की गई। कई संदर्भ ऐसे पाए गए जिनका कोई रिकॉर्ड सिमेंटिक स्कॉलर, ओपनएलेक्स या गूगल स्कॉलर जैसे बड़े डेटाबेस में नहीं मिला।

विशेषज्ञों का कहना है कि AI चैटबॉट्स कई बार ऐसी जानकारी तैयार कर देते हैं जो दिखने में पूरी तरह विश्वसनीय लगती है, लेकिन असल में उसका कोई आधार नहीं होता। यही कारण है कि कई रिसर्चर्स अनजाने में इन फर्जी साइटेशन्स को अपने पेपर्स में शामिल कर रहे हैं।

अध्ययन के अनुसार, साल 2024 के बाद इस समस्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई। चैटजीपीटी जैसे AI प्लेटफॉर्म्स के लोकप्रिय होने के बाद लोग शोध लेखन में AI पर ज्यादा निर्भर होने लगे। धीरे-धीरे AI टूल्स सीधे रेफरेंस और साइटेशन भी तैयार करने लगे।

शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि यह समस्या केवल कुछ संदिग्ध शोधपत्रों तक सीमित नहीं है। कई प्रतिष्ठित और सामान्य दिखने वाले पेपर्स में भी नकली साइटेशन्स पाए गए हैं। इससे अकादमिक विश्वसनीयता को बड़ा खतरा पैदा हो गया है।

बायोमेडिकल रिसर्च में स्थिति और ज्यादा गंभीर मानी जा रही है। अध्ययन के मुताबिक, पहले जहां हजारों पेपर्स में मुश्किल से एक फर्जी साइटेशन मिलता था, वहीं अब यह संख्या तेजी से बढ़ रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैज्ञानिक समुदाय ने जल्द सख्त कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में AI खुद पुराने फर्जी डेटा को आधार बनाकर नए शोध तैयार करेगा। इससे गलत जानकारी का दायरा और बढ़ सकता है।

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