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ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट: क्या भारत बदल देगा हिंद महासागर का शक्ति संतुलन? चीन की ‘मलक्का दुविधा’ पर बढ़ सकता है दबाव

नई दिल्ली: हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट केवल एक बुनियादी ढांचा विकास योजना नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक भू-राजनीतिक दांव माना जा रहा है। करीब 9 अरब डॉलर की लागत वाली इस परियोजना के जरिए भारत समुद्री व्यापार, राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव के तीनों मोर्चों पर अपनी स्थिति मजबूत करने की तैयारी कर रहा है।

अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के दक्षिणी छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक मलक्का जलडमरूमध्य के करीब है। यही वह समुद्री रास्ता है जिससे होकर एशिया और यूरोप के बीच भारी मात्रा में व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थान पर भारत की बढ़ती मौजूदगी भविष्य में हिंद महासागर की रणनीतिक तस्वीर बदल सकती है।

भारत आखिर क्या बनाने जा रहा है?

ग्रेट निकोबार परियोजना के तहत गालाथिया खाड़ी में एक विशाल अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, नागरिक एवं सैन्य उपयोग वाला एयरपोर्ट, बिजली संयंत्र, पर्यटन सुविधाएं और आधुनिक टाउनशिप विकसित की जाएगी। परियोजना का उद्देश्य केवल द्वीप का विकास नहीं, बल्कि इसे एक ऐसे समुद्री हब में बदलना है जो व्यापार और सुरक्षा दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके।

भारत का मानना है कि इससे देश को विदेशी ट्रांसशिपमेंट केंद्रों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। वर्तमान में बड़ी संख्या में भारतीय कंटेनर कोलंबो, सिंगापुर और अन्य विदेशी बंदरगाहों के जरिए भेजे जाते हैं, जिससे अरबों रुपये का संभावित राजस्व देश से बाहर चला जाता है।

चीन के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना?

चीन की अर्थव्यवस्था समुद्री व्यापार पर काफी हद तक निर्भर है। उसके ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा मलक्का जलडमरूमध्य के रास्ते चीन पहुंचता है। यही कारण है कि चीन लंबे समय से इस मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता को अपनी रणनीतिक कमजोरी मानता रहा है। अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक हलकों में इसे “मलक्का दुविधा” के नाम से जाना जाता है।

विश्लेषकों का कहना है कि ग्रेट निकोबार में भारत की मजबूत उपस्थिति चीन के लिए प्रत्यक्ष खतरा नहीं है, लेकिन इससे भारत की निगरानी और सामरिक जागरूकता क्षमता बढ़ेगी। किसी भी क्षेत्रीय तनाव या संकट की स्थिति में यह भारत को महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभ दे सकता है।

व्यापारिक लाभ कितने बड़े हो सकते हैं?

ग्रेट निकोबार का ट्रांसशिपमेंट पोर्ट भारत के लिए आर्थिक दृष्टि से भी गेमचेंजर साबित हो सकता है। बड़े कंटेनर जहाजों को सीधे भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचाने की क्षमता विकसित होने से शिपिंग लागत कम होगी, समय की बचत होगी और भारत वैश्विक समुद्री लॉजिस्टिक्स नेटवर्क में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में यह परियोजना भारत को क्षेत्रीय समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र बनाने में मदद कर सकती है। इससे रोजगार, निवेश और बंदरगाह आधारित उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा।

क्या हैं चुनौतियां?

परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने की है। ग्रेट निकोबार जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र है और यहां आदिवासी समुदायों की मौजूदगी भी है। पर्यावरण संगठनों ने आशंका जताई है कि बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियों से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो सकता है।

सरकार का कहना है कि सभी कानूनी और पर्यावरणीय मंजूरियों के बाद ही परियोजना को आगे बढ़ाया जा रहा है तथा विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया जाएगा।

क्यों महत्वपूर्ण है यह परियोजना?

रक्षा और विदेश नीति विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भारत की समुद्री सोच में बदलाव का प्रतीक है। यह केवल एक बंदरगाह या हवाई अड्डा नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक उपस्थिति का आधार बन सकता है।

यदि यह परियोजना अपने निर्धारित स्वरूप में पूरी होती है, तो आने वाले दशकों में भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक स्तर पर नई ताकत मिल सकती है। यही वजह है कि ग्रेट निकोबार को 21वीं सदी में भारत की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री परियोजनाओं में से एक माना जा रहा है।

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