पति के पुराने बिजली बिल का बकाया पत्नी के खाते में जोड़ना गलत, उपभोक्ता आयोग ने बिजली विभाग को फटकार लगाई।

राजस्थान राज्य उपभोक्ता आयोग का ऐतिहासिक फैसला: पत्नी के बिल में पति का बकाया जोड़ना अनुचित और नियम विरुद्ध
राजस्थान राज्य उपभोक्ता आयोग ने एक महत्वपूर्ण और मिसाल कायम करने वाला निर्णय दिया है, जिसमें स्पष्ट किया गया कि बिजली विभाग पति के नाम के बिजली कनेक्शन का बकाया, पत्नी के अलग कनेक्शन के बिल में जोड़कर वसूली नहीं कर सकता। आयोग ने इस कार्यवाही को न सिर्फ नियम विरुद्ध बताया, बल्कि इसे उपभोक्ता अधिकारों का खुला उल्लंघन भी माना। इस फैसले ने उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एक मजबूत संदेश दिया है कि विभाग किसी भी स्थिति में बिना कानूनी आधार और उचित प्रक्रिया के मनमानी वसूली नहीं कर सकता।
मामले की शुरुआत तब हुई जब जैसलमेर निवासी परिवादिया नजमा बानो ने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई। उनका आरोप था कि मार्च 2021 के बिजली बिल में बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के अचानक 1,61,227 रुपये की अतिरिक्त राशि जोड़ दी गई। यह बकाया रकम उनके पति नवाबुद्दीन के नाम से लिए गए एक पुराने बिजली कनेक्शन से संबंधित थी, जो एक अलग भूखंड पर स्थित था। उन्होंने बताया कि उनके अपने घर पर जो कनेक्शन था, वह पूरी तरह वैध, नियमित और उनके नाम से स्वीकृत था। इसके बावजूद विभाग ने पति का बकाया, पत्नी के बिल में डालकर वसूली की कोशिश की।
बिजली विभाग ने अपनी दलील में कहा कि पति और पत्नी एक ही इकाई माने जाते हैं, इसलिए बकाया रकम की वसूली पत्नी के बिल में जोड़कर करना उचित है। विभाग का यह भी तर्क था कि दोनों कनेक्शन एक ही क्षेत्र में स्थित हैं, इसलिए राशि जोड़ना नियमसंगत है। लेकिन विभाग अपने इस तर्क के समर्थन में कोई स्पष्ट नियम या प्रावधान प्रस्तुत नहीं कर सका।
मामले में जैसलमेर जिला उपभोक्ता आयोग ने पहले ही नजमा बानो के पक्ष में निर्णय सुनाया था। इसके खिलाफ बिजली विभाग ने राजस्थान राज्य उपभोक्ता आयोग, जोधपुर में अपील दायर की। आयोग के अध्यक्ष देवेंद्र कच्छवाहा, सदस्य सुरेंद्र सिंह और सदस्य लियाकत अली की पीठ ने मामले की गंभीरता से सुनवाई की और विभाग की अपील को खारिज कर दिया।
आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि पति और पत्नी के अलग-अलग बिजली कनेक्शन यदि भौतिक रूप से अलग परिसरों में स्थित हैं, तो दोनों को स्वतंत्र उपभोक्ता माना जाएगा। इसके अलावा आयोग ने विद्युत विभाग के मंडल आदेश कमर्शियल-247 का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है जिसके तहत पति के बिजली कनेक्शन की बकाया राशि पत्नी के नाम के कनेक्शन में जोड़ी जा सके। आयोग ने इसे मनमानी वसूली की श्रेणी में रखते हुए विभाग की कार्यवाही को अनुचित ठहराया।
राज्य आयोग ने यह भी कहा कि उपभोक्ता से कोई बड़ी वित्तीय वसूली करने से पहले विभाग को पूर्व सूचना देना और नोटिस जारी करना कानूनी रूप से आवश्यक है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं किया गया। बिना सूचना के भारी भरकम बकाया जोड़ना उपभोक्ता अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
इस फैसले ने उपभोक्ताओं को यह संदेश दिया कि विभागों की मनमानी के खिलाफ कानून उनके साथ है। यदि कोई विभाग बिना नियमों के दबाव बनाकर राशि वसूलता है तो उपभोक्ता आयोग में जाकर न्याय प्राप्त कर सकता है। आयोग का यह आदेश न केवल इस मामले में पीड़ित उपभोक्ता के पक्ष में राहत लेकर आया, बल्कि भविष्य के लिए भी एक मजबूत मार्गदर्शक सिद्धांत साबित हुआ।
अंततः, राज्य उपभोक्ता आयोग ने बिजली विभाग की अपील को पूरी तरह खारिज करते हुए जैसलमेर जिला आयोग के फैसले को सही एवं वैध ठहराया। यह निर्णय उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक बड़ा और सराहनीय कदम माना जा रहा है।



